सूरज
दिन भर जलकर शाम को प्यास बुझाता सूरज
खुद मर मरकर एक एक साँस चुकाता सूरज
खुद मर मरकर एक एक साँस चुकाता सूरज
पूनम की रातों का चंदा तो बस यूं ही यूं ही है
इश्क़ में खुद के पल पल चाँद लुटाता सूरज
इश्क़ में खुद के पल पल चाँद लुटाता सूरज
थकन उदासी तनहाई ये सब रातों के जिगरी हैं
इक आँख में गुज़री हर एक रात भुलाता सूरज
दिल के सर्द कोने में कुछ जमे हुए से किस्से हैं
इक सुकुन में लिपटी मीठी याद रुलाता सूरज
जयश्रीकर पन्त “मनु”
उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
जवाब देंहटाएंनयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले
नयी पोस्ट@श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी
धन्यवाद !!
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