फुटपाथी सपने
खिड़की से अपनी, मैं देख रहा हूँ
कुछ बच्चे छोटे,
कड़ी धूप में दोपहरी की, कुछ खेल रहे हैं
फुटपाथी आँगन में अपने, बड़ी शान से
होठों पर मुस्कान सजी है, जाने ऐसा क्या पाया है
उस फुटपाथी से आँगन में, जाने ऐसा क्या पाया है
खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
कुछ बुनते सपने,
तले वो नीले आसमान के, अब फ़ैल रहे हैं
भूख की तकिया में सिर रखकर , पोषित होते
अँखियों में वो चाँद बसा है, जाने कब से
उनकी अँखियाँ बुनती सपने , जाने कब से
खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
एक ऐसा बचपन,
ले ओढ़ चुनरिया बारिश की जो भीग रहा है
बांध उमर को कमर पे अपनी, बैचनी से
टपक रहा है रातों को, इन फुटपाथों पर
सब कहते हैं ओस गिरी है, इन फुटपाथों पर
खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
नई नज़्म को अपनी,
छापुंगा कॉलम में इसको , संग एक फोटो के
कहीं भिगो दे कुछ पलकें शायद, नम होते ख्वाब
जो चिपटे रहते हैं रातों को, इन फुटपाथों पर
और मँडराते हैं कड़ी धूप में, हमारी कारों की, इन खिड़कियों पर
जयश्रीकर पन्त “मनु”