सोमवार, 27 अक्टूबर 2014



सूरज


दिन भर जलकर शाम को प्यास बुझाता सूरज
खुद मर मरकर एक एक साँस चुकाता सूरज
पूनम की रातों का चंदा तो बस यूं ही यूं ही है
इश्क़ में खुद के पल पल चाँद लुटाता सूरज

थकन उदासी तनहाई ये सब रातों के जिगरी हैं
इक आँख में गुज़री हर एक रात भुलाता सूरज  

दिल के सर्द कोने में कुछ जमे हुए से किस्से हैं
इक सुकुन में लिपटी मीठी याद रुलाता सूरज

जयश्रीकर पन्त “मनु”

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014





फुटपाथी सपने  

खिड़की से अपनी, मैं देख रहा हूँ
कुछ बच्चे छोटे,
कड़ी धूप में दोपहरी की,  कुछ खेल रहे हैं
फुटपाथी आँगन में अपने, बड़ी शान से
होठों पर मुस्कान सजी है, जाने ऐसा क्या पाया है
उस फुटपाथी से आँगन में, जाने ऐसा क्या पाया है

खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
कुछ बुनते सपने,
तले वो नीले आसमान के, अब फ़ैल रहे हैं
भूख की तकिया में सिर रखकर , पोषित होते
अँखियों में वो चाँद बसा है, जाने कब से
उनकी अँखियाँ बुनती सपने , जाने कब से

खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
एक ऐसा बचपन,
ले ओढ़ चुनरिया बारिश की जो भीग रहा है
बांध उमर को कमर पे अपनी, बैचनी से
टपक रहा है रातों को, इन फुटपाथों पर
सब कहते हैं ओस गिरी है,  इन फुटपाथों पर

खिड़की से अपनी मैं देख रहा हूँ
नई नज़्म को अपनी,
छापुंगा कॉलम में इसको , संग एक फोटो के
कहीं भिगो दे कुछ पलकें शायद, नम होते ख्वाब  
जो चिपटे रहते हैं रातों को, इन फुटपाथों पर
और मँडराते हैं कड़ी धूप में, हमारी कारों की, इन खिड़कियों पर

जयश्रीकर पन्त “मनु”