बातों की कील बड़ी नुकीली
होती है
धप्प कर के घुस जाती है
आज़ भी कुछ यूं ही हुआ
इरादा तो न रहा होगा
चोट भी धीमी ही थी
पर कील नुकीली थी
सीधा जा लगी धप्प करके
और फूट पड़ी मेरे दिल की गागर
खून निकला, के पानी
या रिसते रहे जज़्बात
सिकुड़ता रहा आवरण प्यार का
फिर भी कुछ हल्का नहीं है
बल्कि और भारी हो गया है
पता नहीं क्या भर आया इस रिसते सिकुड़ते आवरण में
शायद ये कील
जो अब भी धँसी है
जयश्रीकर पन्त “मनु”
10/11/2014