मंगलवार, 3 नवंबर 2015

कुछ यूं आया है पतझड़

जाने क्या आया फूलों के ज़ी में
सूखे  ठूंठ के ऊपर 
टांग दी अपनी खुशबु
और चूमने लगे ज़मीं को.
पत्ता पत्ता होके 


बिछोह में अपने साथी के
पड़ोस की पत्तियों  ने  भी उतार दिया चटख रंग
और ओढ़ लिए पीले मुरझाये से अंगोछे 


एक एक बूँद निचोड़ ली नम हवाओं से
और फेंक के मारा रात के घुप्प अँधेरे में
अब सूखी हवाएं भागती रहती हैं बेतहाशा
पत्ते दौड़ पड़ते हैं उसे थामने को
दो मिनट को लेते हैं दम
फिर भाग पड़ते हैं।  


ढेर लगा है टूटे ख्वाबों का
कच्चे अरमानों का
सब ज़मींदोज़ हो रहे हैं

पत्ता पत्ता हो के 


जयश्रीकर पंत  'मनु'
03/11/2015

बुधवार, 25 मार्च 2015

आज का दौर

मुस्कुराना दो पल का भी भारी लगता है
तेरा मेरा परिचय दुनियादारी लगता है

मिलना गले तपाक से बचकाना मिज़ाज है
फासले से हाथ मिलाना समझदारी लगता है

बीयर बाइक आईपॉड सब कूल डूड हैं
बुजुर्गों का हाथ बटाना बेरोजगारी लगता है

हैरान परेशान मुल्क है कुछ दौर ऐसा  है
जो खुशमिजाज़ है वो सरकारी लगता है 

जयश्रीकर पन्त “मनु”