"जाने क्या होगा "
सरकारों ने खेल गढ़ा है, फिर से अदला बदली का
नक्कालों की दुनिया में, जाने क्या होगा असली का ।
पहरेदारी और बढ़ा दो, अब “पंचवटी” में दिल्ली की
चौराहों पर गिद्ध हैं बैठे, जाने क्या होगा पगली का ।
बढ़की का तो ब्याह रचाया, अब जैसे तैसे अम्मा ने
छुटकी सोच रही चौके पे, जाने क्या होगा मँझली का
।
अपने नाम की स्याही लगाकर, वो माँगे है सारे सपने
ठेंगा दिखा गया निर्मोही, जाने क्या होगा अंगुली का
।
सपना हो चला है अब तो, ये मुद्दा बिजली पानी का
आँख का पानी बचा नहीं, जाने क्या होगा बिजली का ।
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